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Monday, November 22, 2021
सुख दुख की बातें
Monday, June 15, 2020
मै एक फोजी हूँ,,,,
Saturday, April 11, 2020
हिन्दुस्तान और कोराना
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Thursday, March 5, 2020
"करोना" प्रकृति की शक्ति का अंश मात्र
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Thursday, February 6, 2020
मै एक फोजी हूँ,,,,
Tuesday, July 2, 2019
गरीब के बच्चे का इलाज
कि सुबह का खाना मिलता तो शाम को भूखा सोना पड़ता था
और
कभी शाम को मिलता तो सुबह भूखा रहना पड़ता था।।।
जो घर की छत से टपक रही पानी की बूंदों से पता चल रहा था
क्योंकि घर की छत जगह जगह से टूटी हुई थी और टिन और चदर से बनी हुई थी।।
इतना कहकर पिता बाहर निकला और पास ही की एक किराना की दुकान पर पहुंचा
वहां से उसने दो बिस्किट के पैकेट लिये और वहीं डस्टबिन में पड़ा एक बिस्किट का खाली पैकेट भी हाथ में में उठा लिया।।।
और थोड़ा सा बिस्किट अपने होठों पर रख लिया जिससे लगे कि इसने भी खा लिया हो
इसलिए घरेलू उपचार करने लगे
लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ और
तबीयत ज्यादा बिगड़ने लगी थी
और रिक्शा या गाड़ी करने के पैसे थे नहीं इसलिए उस पिता ने अपने बेटे का भार अपने कंधों पर लिया और और लड़के की मां ने एक पुराना फटा थेला लिया जिसमें एक पानी की बोतल और एक फटी पुरानी चादर के अलावा और कुछ नहीं था।।।
तो उन्होंने जैसे-तैसे करके ₹5 में रसीद कटवाई और डॉक्टर का इंतजार करने लगे!!!
उसके कुछ ही समय बाद उनका भी नंबर आया
या कहीं बाहर बारिश में भीग गया ???
और इसने बाहर तो क्या अंदर भी एक-दो दिन से ज्यादा कुछ नहीं खाया ।।।
उन्होंने डॉक्टर साहब को बीच में ही रोकते हुए बोला डॉक्टर साहब यही तो बस एक जीने की आशा है हम यहां रुकेंगे ।।।
अगर आप बुरा नहीं मानो तो मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं मैं यह थोड़ा बहुत कुछ खाना लेकर कुछ थोड़ा बहुत कुछ खाना लेकर कुछ खाना लेकर आया हूं आप कृपा करके इसको इसको स्वीकार करें मेरे ऊपर भगवान के चढ़े हुए एहसानों उतारने मदद करे ।।।
और मैं चाहता हूं कि मैं किसी जरूरतमंद की सहायता करके अपना यह एहसान उतारना चाहता हूँ।
( क्योंकि लड़के का पिता एक खुद्दार इंसान था लेकिन वह अपने बच्चे को बचाने के लिए मजबूर भी था)
खुशी पाने का जरिया सिर्फ पैसा हो नहीं सकता।।
Monday, July 1, 2019
गरीब की ट्रेन में यात्रा
जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई,
एक औरत और उसका पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़।
दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था।
जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है।
टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए।
" ये जनरल टिकट है।
अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना।
वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।"
कह टीसी आगे चला गया।
पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।
सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे।
बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे।
लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे।
" साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते।हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे।बड़ी मेहरबानी होगी।"
टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।
" सौ में कुछ नहीं होता।आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"
" आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब।नाती को देखने जा रहे हैं।
गरीब लोग हैं, जाने दो न साब।" अबकि बार पत्नी ने कहा।
" तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो।एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।"
" ये लो साब, रसीद रहने दो।दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला।
" नहीं-नहीं रसीद दो बनानी ही पड़ेगी। ऊपर से आर्डर है।रसीद तो बनेगी ही।
चलो, जल्दी चार सौ निकालो।वरना स्टेशन आ रहा है, उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ।"
इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला।
आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो।
दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे
ऐसे बैठे थे ,
मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके शोक में जा रहे हो।
कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए?
क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा?
नहीं-नहीं।
आखिर में पति बोला- " सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था।
गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे।
शाम को खाना नहीं खायेंगे।
दो सौ तो एडजस्ट हो गए।
और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे।
सौ रूपए बचेंगे।
एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा।
सेठ भी चिल्लायेगा।
मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा।
मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए।"
" ऐसा करते हैं,
नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न,
अब दोनों मिलकर सौ देंगे।
हम अलग थोड़े ही हैं।
हो गए न चार सौ एडजस्ट।"
पत्नी के कहा।
" मगर मुन्ने के कम करना....""
और पति की आँख छलक पड़ी।
" मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे। "
कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी।
फिर आँख पोंछते हुए बोली-
" अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी-"
इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय,
इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो,
जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और
ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो।"
उसकी आँख फिर छलक पड़ी।
" अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं,
हमें वोट देने का तो अधिकार है,
पर सलाह देने का नहीं। रो मत।
विनम्र प्रार्थना है
जो भी इस कहानी को पढ़ चूका है उसे इस घटना से शायद ही इत्तिफ़ाक़ हो पर अगर ये कहानी शेयर करे ,
कॉपी पेस्ट करे ,
पर रुकने न दे
शायद रेल मंत्रालय जनरल बोगी की भी परिस्थितियों को समझ सके।
उसमे सफर करने वाला एक गरीब तबका है
जिसका शोषण चिर कालीन से होता आया है।
एक कोशिश परिवर्तन की ओर
....... 😭😭😢😢


