लगा है मर्द का माल,
अब वह ज़रूरतों के लिए नहीं,
अपनी कीमत बचाने
के लिए दौड़ रहा है,,
कभी मर्द की पहचान उसके संस्कार, मेहनत और ज़िम्मेदारी से होती थी।
आज उसकी पहचान उसकी सैलरी, स्टेटस और लाइफस्टाइल से जुड़ गई है।
समाज ने मर्द के लिए
एक पैमाना तय कर दिया है।
कमाई और पैसा
समाज और मर्द की बदलती पहचान :-
आज के समाज में
मर्द से उम्मीद की जाती है
कि वह हर हाल में मज़बूत रहे।
थकान, डर और असफलता
उसके हिस्से नहीं माने जाते।
अगर वह रुक जाए,
तो उसे नाकाम समझ लिया जाता है।
शायद यही कारण है कि
मर्द अपनी ज़रूरत से ज़्यादा
अपनी इज़्ज़त के लिए कमाने लगा है।
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