को ही है तो,
तमाशा करके
भागीदार क्यों बनाना,,
इस लेख की सबसे बड़ी सीख यह है कि
हर दर्द को सबके सामने रखना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं
जो अकेले लड़ी जाएँ
तो इंसान को कमज़ोर नहीं,
बल्कि मजबूत बना देती हैं।
जब हम हर बात का तमाशा बना देते हैं,
तो दर्द कम नहीं होता,
बस दर्शक बढ़ जाते हैं।
खामोशी कमजोरी नहीं है,
यह आत्म-सम्मान का चुनाव भी हो सकती है।
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