बाद में पछताने
से पहले,
क्यों ना एक लास्ट
जी जान वाली
कोशिश हो जाए,,
वह जानता था कि हालात उसके पक्ष में नहीं हैं।
डर था,
असफलता का भी और
लोगों की बातों का भी।
पर उससे बड़ा डर था—
बाद में पछताने का।
उसने सोचा,
“अगर हार ही जानी है,
तो पूरी ताक़त से क्यों न लड़ा जाए?”
क्योंकि अधूरी कोशिश
हार से ज़्यादा चुभती है।
इसलिए उसने तय किया—
डर के साथ ही सही,
पर एक आख़िरी जी-जान वाली
कोशिश ज़रूर करेगा।
हार गया तो कहानी यहीं खत्म,
और जीत गया…
तो यही कहानी उसकी पहचान बन जाएगी।
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