लोग अपनी औकात पर उतर आए
यार भी घात पर उतर आए,
पहले मेरा हुनर खंगला
फिर मेरी जात पर उतर आए,,
यह सिर्फ़ चार पंक्तियाँ नहीं,
बल्कि हमारे समाज का आईना हैं।
यहाँ इंसान की क़ीमत उसके हुनर से कम
और उसकी पहचान से ज़्यादा आँकी जाती है।
जब तक आप कामयाब नहीं होते,
लोग आपकी काबिलियत को परखते हैं।
और जैसे ही आप उनसे आगे निकलते हैं,
वे आपके नाम, आपकी जात,
और आपकी जड़ों पर सवाल उठाने लगते हैं।
सबसे अफ़सोस की बात तब होती है
जब अपने ही,
जो कभी कंधे से कंधा मिलाकर चले थे,
वही पीठ पीछे घात लगाने लगते हैं।
शायद यही ज़िंदगी का उसूल है—
हुनर रास्ता बनाता है,
और सोच बताती है
कि उस रास्ते पर
कौन साथ चलेगा
और कौन पत्थर फेंकेगा।