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Saturday, January 10, 2026

किरदार इतना खूबसूरत बनाना मेरे दोस्त…

किरदार इतना खूबसूरत 
बनाना मेरे दोस्त,

कि लोग छोड़ तो पाए…
पर भुला नहीं पाए।





मैंने रिश्तों में कभी शोर नहीं किया,

बस जैसा था
वैसा ही निभाया।

शायद यही मेरी गलती थी,
या शायद यही मेरी पहचान।


कुछ लोग साथ इसलिए नहीं चले
क्योंकि उनके रास्ते बदल गए थे,
मेरे कदम नहीं।

मैं वहीं खड़ा रहा
अपने उसूलों के साथ,
और वो आगे बढ़ गए
अपनी सहूलियतों के साथ।

वक़्त बीतता गया,
नाम यादों में धुंधला नहीं पड़ा,
क्योंकि किरदार
हालात से नहीं
नीयत से बनता है।

आज जब कभी मेरा ज़िक्र आता है,
तो लोग खामोश हो जाते हैं।

शायद इसलिए नहीं
कि मैं परफेक्ट था,
बल्कि इसलिए
कि मैं नकली नहीं था।

और यही सच्चाई है—

किरदार अगर साफ़ हो,
तो लोग छोड़ सकते हैं,
मगर भुला नहीं पाते।

Friday, January 9, 2026

तमाशा मत बना

जब सहना खुद 
को ही है तो, 

तमाशा करके 
भागीदार क्यों बनाना,,


इस लेख की सबसे बड़ी सीख यह है कि

हर दर्द को सबके सामने रखना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं

जो अकेले लड़ी जाएँ
तो इंसान को कमज़ोर नहीं,
बल्कि मजबूत बना देती हैं।

जब हम हर बात का तमाशा बना देते हैं,
तो दर्द कम नहीं होता,
बस दर्शक बढ़ जाते हैं।
खामोशी कमजोरी नहीं है,

यह आत्म-सम्मान का चुनाव भी हो सकती है।

Thursday, January 8, 2026

ठोकरें हैं जहर थोड़ी ही है

ए मंजिल 
एक ना एक दिन 
तुझे जरूर पाऊंगा, 

ठोकरें है जहर
थोड़े ही है जो 
मर जाऊंगा,,




✍️ वास्तविक जीवन से जुड़ाव :

हर सफल व्यक्ति के जीवन में
ऐसा दौर ज़रूर आया है
जब हालात ज़हर जैसे लगे हों।

लेकिन उन्हीं हालातों ने
उन्हें मज़बूत बनाया,

और मंज़िल तक पहुँचाया।


🔚 निष्कर्ष (Conclusion):

मंज़िल उन लोगों को मिलती है
जो ठोकरों को वजह नहीं,
सीढ़ी बना लेते हैं।

अगर इरादा मज़बूत हो,
तो ज़हर भी
हौसले के सामने
बेअसर हो जाता है।

Wednesday, January 7, 2026

रूठना मनाना

केवल इतना ही 
रूठना अपनों से,

आपकी बात और 
सामने वाले की इज्जत 
दोनों ही बरकरार रहे,,



इस लेख से हमें यह सीख मिलती है कि

रूठना गलत नहीं है,
लेकिन तमीज़ से रूठना
एक कला है।

हर बात पर ताना देना
बार-बार अपमान करना
या बात को तमाशा बनाना
ये सब रिश्तों को नहीं,
इज्जत को नुकसान पहुँचाते हैं।

समझदारी इसमें है
कि अपनी बात भी कही जाए
और सामने वाले का मान भी बना रहे।


✍️ निष्कर्ष (Conclusion) :

रिश्ते आवाज़ से नहीं,
सम्मान से चलते हैं।

अगर रूठना पड़े,
तो इतना ही रूठिए

कि सुलह की गुंजाइश
हमेशा ज़िंदा रहे।


Tuesday, January 6, 2026

स्कूल वाली दोस्ती

बरसों बाद मिले 
तो ऐसा हुआ,

वह स्कूल वाली घंटी 
अब भी बजती है 
दिल में ❣️



🖋️ छोटी कहानी – स्कूल वाली घंटी

बरसों बाद मिले तो ऐसा हुआ,
वह स्कूल वाली घंटी
अब भी बजती है
दिल में।

वक़्त ने हमें
अलग-अलग रास्तों पर पहुँचा दिया था।
कोई नौकरी में व्यस्त,
कोई परिवार में,
तो कोई ज़िंदगी से ही जूझता हुआ।

लेकिन जैसे ही नज़रें मिलीं,
सालों का फासला
एक पल में मिट गया।

वही हँसी,
वही नाम लेकर चिढ़ाना,
वही बिना वजह की बातें।

क्लासरूम तो कहीं पीछे छूट गया था,
लेकिन दिल के अंदर
आज भी वही बेंच,
वही दोस्त,
और वही घंटी मौजूद थी।

जो हर मुलाक़ात पर
फिर से बज उठती है।


🌱 इससे मिलने वाली सीख:

इस लेख से हमें यह एहसास होता है कि

कुछ रिश्ते समय के मोहताज नहीं होते।

स्कूल की दोस्ती
ना फायदे से जुड़ी होती है,
ना ज़िम्मेदारी से।

वह बस
दिल से जुड़ी होती है।

बरसों बाद मिलकर भी
अगर दिल वही महसूस करे,

तो समझ लीजिए
वह रिश्ता आज भी ज़िंदा है।


✍️ निष्कर्ष (Conclusion) :

वक़्त हमें कितना भी बदल दे,

कुछ आवाज़ें
हमेशा दिल में गूंजती रहती हैं।

स्कूल की घंटी
शायद अब कानों तक न पहुँचे,

लेकिन दिल में
आज भी उतनी ही साफ़ बजती है।