अब क्या बेचूं ऐ फुर्सत
तुझे पाने को,
खुद तक को खर्च
कर दिया जिम्मेदारियां
निभाने में,,
इज्जत आदमी की
नहीं होती है भाई,
आमदनी की
होती है,,
अब क्या बेचूं ऐ फुर्सत
तुझे पाने को,
खुद तक को खर्च
कर दिया जिम्मेदारियां
निभाने में,,
जो समझता है
वह भी,
समझ समझ कर
थक जाता है,,
दर पर पड़ी बाप की चप्पल,
यह भी एक अलग ही
गुरुर है,,