नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई
~ गोपालदास जी "नीरज"
थक जाओगे परवाह
करते करते लोगों
कि बन्दगी मे,,
एक बार बेपरवाह
होकर तो देखो
आराम सा हो जाता है
जिन्दगी मे !!