मुसाफिर कल भी था,
मुसाफिर आज भी हूँ;
कल अपनों की तलाश में था,
आज अपनी तलाश में हूँ।
न जाने कौन सी शोहरत
पर आदमी को नाज है,
जबकि आखरी सफर के लिए भी
आदमी औरों का मोहताज है
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