ओ नारी ! कैसे कह दूं, तुम कुछ नहीं हो
ज्ञान जो चाहें सरस्वती तुम,
मान जो चाहें लक्ष्मी हो तुम
अपराधों का साया छाये धरती पर,
तो काली-दुर्गा का रूप हो तुम
ओ नारी ! कैसे कह दूं, तुम कुछ नहीं हो।
खुशियों का संसार तुम्हीं से,
जीने के आधार तुम्हीं से
बंद होते और खुलते भी हैं,
दुनिया के दरबार तुम्हीं से
ओ नारी ! कैसे कह दूं, तुम कुछ नहीं हो।
प्रेम की शुरुआत तुम्हीं से,
जीवन का आगाज तुम्हीं से
ये जहां है जगमग सूरज से,
सूरज की चमकार तुम्हीं से
ओ नारी ! कैसे कह दूं, तुम कुछ नहीं हो।
कभी कठोर-कभी नेक हो तुम,
हर रिश्ते में हरि एक हो तुम
ममता-शक्ति और मुहब्बत,
नारी तुम एक हो मगर अनेक हो तुम
ओ नारी ! कैसे कह दूं, तुम कुछ नहीं हो।
आन-बान और शान तुम्हीं से,
संस्कारों की खान तुम्हीं से
दर्द-त्याग और ममता की है,
संसार में पहचान तुम्हीं से
ओ नारी ! कैसे कह दूं, तुम कुछ नहीं हो।
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