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Thursday, June 27, 2019

मेरा गांव

   *एक बार गाँव में भी आया करों*

  दौलत की अंधी दौड़ में गांव सुनसान पड़े है .

  नाच नाच कर जो भगवान बैठाए मन्दिर में ,
  वे मन्दिर सुनसान पड़े है.

  पुजारी पगार पर बुलाया जा रहा,
  लोग गांव का घर बेचने की जिद पर अड़े है.

  मत भागो दूर अपने अस्तित्व से,
  गांव के महलों जैसे घर के मालिक,
  शहरों में सिकुड़े पड़े है.

  ओर कहते है कि
  हम तररकी की राह पर खड़े है।।

  माना कि गांव में बरस भर रह नहीं सकते
  पर छुट्टियां तो गांव में मनाया करो,

  गर्मी अच्छी ना लगे तो सर्दी में आया करो
  सर्दी अच्छी ना लगे तो होली पे आया करो

  होली अच्छी ना लगे तो
दीवाली में आया करो

भले तीन छुट्टियां मनाओं शहर में

  पर

*एक बार तो गांव में भी आया करो*

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