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Sunday, January 11, 2026
संवाद
हो सके तो
संवाद करना,
विवाद में किसी को
क्या ही मिला है,,
इसलिए अब वह चुप है,
क्योंकि उसका हर जवाब
एक नया विवाद बन जाता था।
फिर उसने बोलना नहीं,
समझना चुना।
थोड़े शब्द,
थोड़ी खामोशी,
और बहुत-सी बात हो गई।
Saturday, January 10, 2026
किरदार इतना खूबसूरत बनाना मेरे दोस्त…
किरदार इतना खूबसूरत
बनाना मेरे दोस्त,
कि लोग छोड़ तो पाए…
पर भुला नहीं पाए।
मैंने रिश्तों में कभी शोर नहीं किया,
बस जैसा था
वैसा ही निभाया।
शायद यही मेरी गलती थी,
या शायद यही मेरी पहचान।
कुछ लोग साथ इसलिए नहीं चले
क्योंकि उनके रास्ते बदल गए थे,
मेरे कदम नहीं।
मैं वहीं खड़ा रहा
अपने उसूलों के साथ,
और वो आगे बढ़ गए
अपनी सहूलियतों के साथ।
वक़्त बीतता गया,
नाम यादों में धुंधला नहीं पड़ा,
क्योंकि किरदार
हालात से नहीं
नीयत से बनता है।
आज जब कभी मेरा ज़िक्र आता है,
तो लोग खामोश हो जाते हैं।
शायद इसलिए नहीं
कि मैं परफेक्ट था,
बल्कि इसलिए
कि मैं नकली नहीं था।
और यही सच्चाई है—
किरदार अगर साफ़ हो,
तो लोग छोड़ सकते हैं,
मगर भुला नहीं पाते।
Friday, January 9, 2026
तमाशा मत बना
जब सहना खुद
को ही है तो,
तमाशा करके
भागीदार क्यों बनाना,,
इस लेख की सबसे बड़ी सीख यह है कि
हर दर्द को सबके सामने रखना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं
जो अकेले लड़ी जाएँ
तो इंसान को कमज़ोर नहीं,
बल्कि मजबूत बना देती हैं।
जब हम हर बात का तमाशा बना देते हैं,
तो दर्द कम नहीं होता,
बस दर्शक बढ़ जाते हैं।
खामोशी कमजोरी नहीं है,
यह आत्म-सम्मान का चुनाव भी हो सकती है।
Thursday, January 8, 2026
ठोकरें हैं जहर थोड़ी ही है
ए मंजिल
एक ना एक दिन
तुझे जरूर पाऊंगा,
ठोकरें है जहर
थोड़े ही है जो
मर जाऊंगा,,
✍️ वास्तविक जीवन से जुड़ाव :
हर सफल व्यक्ति के जीवन में
ऐसा दौर ज़रूर आया है
जब हालात ज़हर जैसे लगे हों।
लेकिन उन्हीं हालातों ने
उन्हें मज़बूत बनाया,
और मंज़िल तक पहुँचाया।
🔚 निष्कर्ष (Conclusion):
मंज़िल उन लोगों को मिलती है
जो ठोकरों को वजह नहीं,
सीढ़ी बना लेते हैं।
अगर इरादा मज़बूत हो,
तो ज़हर भी
हौसले के सामने
बेअसर हो जाता है।
Wednesday, January 7, 2026
रूठना मनाना
केवल इतना ही
रूठना अपनों से,
आपकी बात और
सामने वाले की इज्जत
दोनों ही बरकरार रहे,,
इस लेख से हमें यह सीख मिलती है कि
रूठना गलत नहीं है,
लेकिन तमीज़ से रूठना
एक कला है।
हर बात पर ताना देना
बार-बार अपमान करना
या बात को तमाशा बनाना
ये सब रिश्तों को नहीं,
इज्जत को नुकसान पहुँचाते हैं।
समझदारी इसमें है
कि अपनी बात भी कही जाए
और सामने वाले का मान भी बना रहे।
✍️ निष्कर्ष (Conclusion) :
रिश्ते आवाज़ से नहीं,
सम्मान से चलते हैं।
अगर रूठना पड़े,
तो इतना ही रूठिए
कि सुलह की गुंजाइश
हमेशा ज़िंदा रहे।
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