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Friday, August 2, 2019

किसान हूं मैं

मिट्टी का बेटा हूं इसमें ही पला बढ़ा
इज्जत जमीन की करना जानता हूँ,


चीर के सीना धरती का
पेट दुनिया का पालता हूं,,


सूनी पड़ी वीरान जमी को
कैसे करूं सुहागन जानता हूं,


कर दूंगा एक दाने से सैंकड़ों
बस यही आस में पलता हूँ,,


गर्मी सर्दी हो या बरसात
कैसे किस से जूझना जानता हूं,


खून पसीने से सिंचता मैं धरा धीरज
अंकुर को बेटे सा पालता हूं,,


मत सोचो आसान जिंदगी मेरी
कितनी मेहनत जरूरी में ही जानता हूं,

पूरे करेगा रब सपने सारे बच्चों के मेरे
बस यही विश्वास मन में पालता हूं,,


मत सताओ इतना वरना
संत से परशुराम बनना भी जानता हूं,

सोच रहे हो उतना नहीं हूं कमजोर
मैं हथियारों का शौक भी पालता हूँ,,



कह दो उनसे घमंड है गहरा रोग
बुरा होता है फल इसका जानता हूँ,

झुक कर झेल लूं आंधियां उन कोमल पौधों जैसे 
शौक मगरूर पेड़ों से नहीं मैं पालता हूं,,


नहीं हुआ यहां पर अमर कोई
सबको है मिल जाना इसी मिट्टी में जानता हूं,

किसान हूं समझता मैं कीमत भूख की
दुखों के तूफान बस दिल में पालता हूं,,



मिट्टी का बेटा हूं इज्जत जमीन की करना जानता हूँ,, 

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