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Tuesday, November 12, 2019

कवियों के बोल

एक नए साँचे में ढल जाता हूँ मैं 
क़तरा क़तरा रोज़ पिघल जाता हूँ मैं 

जब से वो इक सूरज मुझ में डूबा है 
ख़ुद को भी छू लूँ तो जल जाता हूँ मैं 

~भारत भूषण पन्त

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ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, 
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।
 
इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं, 
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं| 

धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून 
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं।

~कृष्ण बिहारी 'नूर'

Sunday, November 3, 2019

समझदारी


एक दिन देवरानी और जेठानी में किसी बात पर जोरदार बहस हुई और दोनों में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का मुह तक ना देखने की कसम भी खा ली और अपने-अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया।

थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई,

जेठानी गुस्से में ऊंची आवाज में बोली कौन है,

बाहर से आवाज़ आई,
दीदी मैं।

जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली 

अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी,

अब यहाँ क्यों आई हो ?


देवरानी ने कहा,
दीदी सोच कर तो गई थी,
पर माँ की कही एक बात याद आ गई,
कि जब किसी से कुछ कहा-सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाईयों को याद करो और मैंने भी यही किया,

मुझें आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया 

और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई, 

बस फिर क्या था दोनों रोते-रोते एक दूसरे के गले लग गई और 
साथ बैठ कर चाय पीने लगी।


जीवन में क्रोध को क्रोध से नहीं जीता सकता है,

बोध से जीता जा सकता है।


अग्नि,अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है,

समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम से बोलकर संभाल लेते है,

हर परिस्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ट होता है।

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